वर्तमान शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह बदलने की आवश्यकता क्यों है?
वर्तमान शिक्षा प्रणाली पुरानी, परीक्षा-केंद्रित और वास्तविक जीवन की ज़रूरतों से कटी हुई है। जानिए क्यों शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह अपग्रेड करने की ज़रूरत है, ताकि छात्रों को आधुनिक करियर, तकनीक और जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा सके।
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हमारी आज की शिक्षा प्रणाली एक ऐसे समय में बनाई गई थी, जब दुनिया बिल्कुल अलग थी। तब शिक्षा का मकसद ऐसे लोग तैयार करना था जो आदेश मानें, एक जैसा काम करें और तय नौकरी में फिट हो जाएँ। लेकिन आज की दुनिया बदल चुकी है। अब रचनात्मक सोच, नई चीज़ें सीखने की क्षमता, भावनाओं को समझना और खुद को हालात के अनुसार ढालना बहुत ज़रूरी हो गया है। इसके बावजूद हमारी शिक्षा प्रणाली आज भी रटने और अंकों पर ही टिकी हुई है। यही वजह है कि अब शिक्षा में बदलाव ज़रूरी हो गया है।
आज की पढ़ाई की सबसे बड़ी समस्या है रटना। बच्चों को किताबें याद करने और परीक्षा में वही लिखने के लिए तैयार किया जाता है। परीक्षा खत्म होते ही ज़्यादातर बातें भूल जाती हैं। असली ज़िंदगी में सफलता याददाश्त से नहीं, बल्कि समस्या हल करने, सही फैसले लेने, बात समझाने और नई चीज़ें सीखने से मिलती है। जब पढ़ाई का मतलब सिर्फ नंबर बन जाता है, तो बच्चे जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार नहीं हो पाते।
एक और बड़ी समस्या यह है कि सभी बच्चों को एक ही तरीके से पढ़ाया जाता है। जबकि हर बच्चा अलग होता है। कोई करके सीखता है, कोई देखकर, कोई बात करके। लेकिन सिस्टम उन बच्चों को कमजोर मान लेता है जो किताबों और परीक्षाओं में अच्छा नहीं कर पाते। इससे बच्चों का आत्मविश्वास टूटता है और उनकी असली प्रतिभा सामने नहीं आ पाती।
हमारा पाठ्यक्रम भी अक्सर पुराना और जीवन से जुड़ा नहीं होता। बच्चे सालों तक पढ़ते हैं, लेकिन यह नहीं समझ पाते कि इसका असली ज़िंदगी में क्या उपयोग है। पैसे संभालना, मानसिक स्वास्थ्य, बातचीत करना, डिजिटल समझ जैसे ज़रूरी विषयों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। वहीं नई तकनीक, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा की समझ, पढ़ाई का हिस्सा नहीं बन पाती। इसलिए पढ़ाई पूरी करने के बाद भी कई बच्चे नौकरी और जीवन के लिए तैयार नहीं होते।
शिक्षकों की हालत भी आसान नहीं है। उन पर सिलेबस पूरा करने और परीक्षा के रिज़ल्ट का दबाव होता है। ऐसे में वे बच्चों को समझाने और उनका मार्गदर्शन करने के बजाय सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा करने में लगे रहते हैं। अगर शिक्षा प्रणाली बेहतर बने, तो शिक्षक बच्चों को सोचने, सवाल पूछने और खुद सीखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
परीक्षा प्रणाली भी बच्चों पर बहुत दबाव डालती है। एक ही परीक्षा से बच्चे की काबिलियत तय कर दी जाती है। इससे डर, तनाव और चिंता बढ़ती है। बच्चे गलती करने से डरते हैं, जबकि गलती करना सीखने का हिस्सा है। असली जीवन में इंसान बार-बार कोशिश करके ही आगे बढ़ता है।
तकनीक होते हुए भी शिक्षा में उसका सही उपयोग नहीं हो रहा है। कई जगह बस किताबों की जगह मोबाइल या टैबलेट दे दिए जाते हैं। लेकिन असली बदलाव तब होगा जब तकनीक से हर बच्चे को उसकी जरूरत के अनुसार सीखने का मौका मिले और वह दुनिया से जुड़ सके।
इस पूरी प्रणाली का सबसे बुरा असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। नंबरों की दौड़, तुलना और असफल होने का डर बच्चों को अंदर से कमजोर कर देता है। शिक्षा का काम बच्चों को मजबूत बनाना होना चाहिए, न कि उन्हें थका देना।
शिक्षा को बदलने का मतलब अनुशासन खत्म करना नहीं है। इसका मतलब है शिक्षा का असली उद्देश्य समझना। शिक्षा का लक्ष्य ऐसे इंसान बनाना होना चाहिए जो समझदार हों, दयालु हों, खुद सोच सकें और बदलती दुनिया में खुद को ढाल सकें।
आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में पुरानी शिक्षा प्रणाली से चिपके रहना नुकसानदायक है। शिक्षा में पूरा बदलाव सिर्फ स्कूल या क्लासरूम सुधारने के लिए नहीं है, बल्कि यह तय करने के लिए है कि हम बच्चों को जीवन जीना सिखा रहे हैं या सिर्फ परीक्षा पास करना।