हम अपनी मिट्टी को धीरे-धीरे कैसे मार रहे हैं?
किस तरह हानिकारक कृषि प्रथाएँ, जैसे पराली जलाना और रसायनों का अत्यधिक उपयोग, मिट्टी की सेहत को नुकसान पहुंचा रही हैं और कौन से टिकाऊ (सस्टेनेबल) तरीके हमारी ज़मीन को बचा सकते हैं, इसे जानें।
AGRICULTUREENVIRONMENT


भारत जैसे कृषि प्रधान देश में खेती सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि लाखों लोगों की जीवनशैली है। खेत, फसलें, मौसम और मिट्टी किसानों की रोज़मर्रा की दुनिया तय करते हैं। लेकिन जब आधुनिक मशीनें और रासायनिक उर्वरक बड़े पैमाने पर आए, तो फसल कटाई के बाद बचने वाली पराली (crop residue) भी तेजी से बढ़ गई। धान, गेहूँ, गन्ना, कपास और मक्का जैसी फसलों के कटाई के बाद खेतों में सूखी लकड़ी, भूसी, पत्तियाँ और तना बच जाता है। पहले यह जानवरों के चारे या जमीन में गलकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में इस्तेमाल होता था।
लेकिन अब कम्बाइन हार्वेस्टर जैसी मशीनों के आने से फसल जल्दी कट जाती है, लेकिन तना इतना कठोर और भारी होता है कि हाथ से हटाना मुश्किल हो जाता है। इसलिए कई किसान इसे जलाना चुनते हैं क्योंकि यह तेज़ और आसान लगता है।
पराली जलाना आसान समाधान लगता है, लेकिन इसके पीछे बहुत बड़े खतरे हैं। यह मिट्टी, हवा, इंसानों, जानवरों, पानी और पूरे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। जब पराली जलती है, तो धुआँ फैलता है और गाँवों और शहरों में स्मॉग बनाता है। इसमें कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फ़र डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और फाइन पार्टिकुलेट मैटर जैसे जहरीले गैसें होती हैं, जो लंबी दूरी तक फैलकर सांस की बीमारियाँ पैदा करती हैं।
हर साल अक्टूबर-नवंबर में, उत्तर भारत की हवा बहुत प्रदूषित हो जाती है। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में धुंध और धुआँ छा जाता है। स्कूल बंद हो जाते हैं, अस्पताल में मरीज बढ़ जाते हैं और हवा ख़तरनाक स्तर पर पहुँच जाती है।
जब किसान पराली जलाते हैं, तो मिट्टी की सतह का तापमान 400–500°C तक पहुँच जाता है। इतने तेज़ ताप में मिट्टी में रहने वाले लाभकारी सूक्ष्मजीव तुरंत मर जाते हैं। ये जीव मिट्टी को नरम रखते हैं, पौधों की जड़ें मजबूत करते हैं और पोषक तत्व बनाए रखते हैं। इनके बिना मिट्टी कठोर हो जाती है, पानी कम रखती है और प्राकृतिक उर्वरता घट जाती है। फिर किसान रासायनिक उर्वरक ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, जिससे खर्च बढ़ता है और मिट्टी धीरे-धीरे बंजर हो जाती है।
पराली जलने से कार्बन, नाइट्रोजन, फॉस्फ़ोरस और पोटेशियम जैसी ज़रूरी पोषक तत्व भी हवा में निकल जाते हैं। समय के साथ, ऐसे खेतों में फसल का उत्पादन कम होने लगता है।
यह सिर्फ मिट्टी और हवा को ही नहीं, बल्कि इंसानों और जानवरों को भी प्रभावित करता है। धुआँ आंखों और गले में जलन, सिरदर्द, खांसी, सांस लेने में दिक्कत, अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियाँ पैदा करता है। बच्चे, बूढ़े और गर्भवती महिलाएँ सबसे ज़्यादा प्रभावित होती हैं। जानवरों की भी सेहत बिगड़ती है और दूध देने वाले पशु तनाव में आते हैं।
जलवायु परिवर्तन भी बढ़ता है। पराली जलाने से लाखों टन ग्रीनहाउस गैसें, जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन, वातावरण में जाती हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग तेज़ होती है।
लेकिन इस समस्या का समाधान संभव है। पराली जलाने की जगह आज कई मशीनें और तकनीकें उपलब्ध हैं। जैसे:
हैप्पी सीडर (Happy Seeder), मल्चर, रोटावेटर और रिवर्सिबल प्लॉ — ये पराली को जमीन में मिलाते हैं, मिट्टी की नमी और पोषण बढ़ाते हैं।
बैलेर मशीन — पराली को बंडलों में बदलकर उद्योगों को बेच सकते हैं। यह बायोफ्यूल, कागज़ और ऊर्जा बनाने में काम आती है।
पराली को पशु चारे या ऑर्गेनिक कंपोस्ट में बदला जा सकता है। यह मिट्टी को स्वस्थ रखता है और रासायनिक उर्वरक की ज़रूरत कम करता है।
मल्चिंग — पराली को पौधों के आसपास फैलाना, मिट्टी की नमी बनाए रखता है और खरपतवार कम करता है।
बायोगैस प्लांट्स — पराली और गोबर से गाँवों में ऊर्जा और जैविक खाद बनाई जा सकती है।
असल बात यह है कि पराली जलाना बहुत से किसानों के लिए मजबूरी बन गया है क्योंकि उनके पास समय, मशीन या सस्ते विकल्प नहीं हैं। बहुत से किसान इसके हानिकारक प्रभाव जानते हैं, लेकिन उनके पास विकल्प नहीं हैं। इसलिए सरकार, समाज और संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे मशीनें, सब्सिडी, जागरूकता और उचित इन्फ्रास्ट्रक्चर दें। अगर गाँवों में पराली संग्रह केंद्र, मशीन बैंक और उद्योग हों जो उचित दाम दें, तो जलाने की प्रथा खत्म की जा सकती है।
अगर हम पर्यावरण बचाना, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना और आने वाली पीढ़ियों को साफ़ हवा देना चाहते हैं, तो पराली जलाना बंद करना होगा। यह सिर्फ कृषि का मुद्दा नहीं है, बल्कि पर्यावरण और मानवता का मुद्दा है। मिट्टी हमें जीवन देती है खाना, पानी, हवा और समृद्धि। इसकी रक्षा हमारी ज़िम्मेदारी है।
सतत खेती और सही तरीके से संसाधनों का उपयोग ही भविष्य है। पराली प्रबंधन सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि एक ज़रूरत है स्वस्थ ग्रह, स्वस्थ लोग और मजबूत खेती के लिए।