12 मिलियन नौकरियाँ या इंसानी जान? क्विक कॉमर्स की अनकही सच्चाई
क्विक कॉमर्स में सुरक्षा की चिंताएँ सच हैं, लेकिन भारत के 1.2 करोड़ लोगों की रोज़ी-रोटी भी उतनी ही सच है। यह ब्लॉग बताता है कि सुरक्षा और रोजगार को लड़ाया नहीं जाना चाहिए, बल्कि दोनों को साथ लेकर चलना ही असली समाधान है।
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भारत की गिग इकॉनॉमी चुपचाप देश के सबसे बड़े रोज़गार के स्रोतों में से एक बन चुकी है। आज लगभग 1.2 करोड़ लोग गिग वर्कर के रूप में अपनी रोज़ी कमा रहे हैं, और इनमें से एक बड़ा हिस्सा क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर निर्भर है। ये प्लेटफॉर्म सिर्फ़ उपभोक्ताओं तक ज़रूरी सामान जल्दी पहुँचाने का तरीका नहीं हैं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए रोज़गार का सहारा हैं, जिनके पास स्थायी नौकरी के ज़्यादा विकल्प नहीं थे। किसी के लिए यह पहली कमाई है, किसी के लिए परिवार चलाने का एकमात्र जरिया।
हाल के समय में क्विक कॉमर्स को लेकर सुरक्षा के मुद्दों पर गंभीर चर्चा शुरू हुई है। ये चिंताएँ बिल्कुल जायज़ हैं। डिलीवरी पार्टनर्स को रोज़ सड़क हादसों का खतरा, समय का दबाव, लंबी शिफ्ट्स और खराब ट्रैफिक जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। किसी भी सभ्य समाज में इंसानी जान से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता, और इन खतरों को नज़रअंदाज़ करना गलत होगा। सुरक्षा पर सवाल उठना ज़रूरी है।
लेकिन साथ ही, पूरी तस्वीर देखे बिना जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला बहुत बड़ी मानवीय कीमत वसूल सकता है। कई गिग वर्कर्स के लिए क्विक कॉमर्स कोई साइड जॉब नहीं, बल्कि उनकी एकमात्र आय का स्रोत है। इसी कमाई से घर का किराया जाता है, बच्चों की पढ़ाई चलती है, बूढ़े माता-पिता की दवाइयाँ आती हैं और रोज़ का खाना बनता है। अगर इन सेवाओं को अचानक बंद कर दिया गया या बहुत सख़्त पाबंदियाँ लगा दी गईं, तो लाखों परिवारों की आमदनी एक ही झटके में खत्म हो जाएगी। गरीबी और असुरक्षा रातों-रात दरवाज़े पर खड़ी हो जाएगी।
इसका असर सिर्फ़ डिलीवरी राइडर्स तक सीमित नहीं रहेगा। वेयरहाउस, ऑपरेशंस, टेक्नोलॉजी, कस्टमर सपोर्ट और मैनेजमेंट में काम करने वाले हज़ारों कर्मचारी भी प्रभावित होंगे। इसके आगे पूरा सप्लाई नेटवर्क हिल जाएगा छोटे दुकानदार, लोकल सप्लायर्स, ट्रांसपोर्ट सेवाएँ और कई सहायक व्यवसाय, जो इस सिस्टम पर टिके हैं, सब पर असर पड़ेगा। ऐसे समय में जब भारत पहले से ही युवाओं के रोज़गार की चुनौती से जूझ रहा है, किसी पूरे सेक्टर को बंद करना बेरोज़गारी और आर्थिक अनिश्चितता को और गहरा कर सकता है।
यही वजह है कि इस बहस को “सुरक्षा बनाम रोज़गार” के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। असली सवाल यह नहीं है कि किसे चुनें, बल्कि यह है कि दोनों को साथ कैसे बचाया जाए। किसी इंडस्ट्री को पूरी तरह बंद कर देना आसान लगता है, लेकिन इससे जो नई समस्याएँ पैदा होंगी, वे शायद मौजूदा समस्याओं से भी ज़्यादा खतरनाक हों।
समाधान मौजूद है, और वह संतुलन में है। सेवाएँ बंद किए बिना भी सुरक्षा को बेहतर बनाया जा सकता है। अवास्तविक डिलीवरी टाइम को सीमित किया जा सकता है ताकि राइडर्स को सड़क पर जान जोखिम में न डालनी पड़े। कंपनियों को बीमा, उचित वेतन, और नियमित सेफ्टी ट्रेनिंग देना अनिवार्य किया जा सकता है। ट्रैफिक नियमों का सख़्ती से पालन सिर्फ़ डिलीवरी वर्कर्स ही नहीं, बल्कि हर नागरिक की सुरक्षा बढ़ाएगा। टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल करके रूट ऑप्टिमाइज़ेशन, टाइम प्रेशर कम करना और असुरक्षित व्यवहार की निगरानी भी संभव है।
ज़रूरत सुधार की है, समाप्ति की नहीं। रेगुलेशन का मकसद गलतियों को ठीक करना होना चाहिए, न कि उन करोड़ों लोगों की रोज़ी छीन लेना जो इस सिस्टम पर निर्भर हैं। सुरक्षा सुधारने में समय, नीति और सहयोग लगता है, लेकिन यह नामुमकिन नहीं है।
मेरी बात सीधी है। सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए, लेकिन रोज़गार की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। किसी भी सेवा को बंद करने या सीमित करने से पहले हर प्रभावित वर्कर के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक विकल्प मौजूद होना चाहिए। भारत जैसे देश में सुरक्षा और रोज़गार को आमने-सामने खड़ा करना गलत है। दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ना होगा—इंसान की जान भी बचे, और उसका घर भी चलता रहे।