भारत में शादियों का बढ़ता खर्च
भारत में शादियों का बढ़ता खर्च परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव डाल रहा है, पारंपरिक रिवाज़ों को बदल रहा है और शादियों को पहले से ज़्यादा भव्य और दिखावटी बना रहा है।
CULTURE


भारत में शादी सिर्फ एक रस्म या त्योहार नहीं होती, बल्कि यह एक भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक घटना होती है। इसमें परिवार की इज़्ज़त, यादें और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएँ जुड़ी होती हैं। “शादी” शब्द सुनते ही रंग बिरंगे कपड़े, भारी गहने, सजे हुए हॉल, स्वादिष्ट खाना और लंबी मेहमानों की सूची आंखों के सामने आ जाती है। सदियों से शादियाँ भारतीय समाज का केंद्र रही हैं। लेकिन पिछले 20 सालों में शादियों का स्वरूप बहुत बदल गया है। अब शादियाँ छोटे पारिवारिक समारोह नहीं रहीं, बल्कि एक बड़ा और मुनाफ़े वाला उद्योग बन चुकी हैं। 2024–2025 तक आते-आते भारतीय शादी बाज़ार दुनिया के सबसे भव्य और तेज़ी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में शामिल हो गया है।
आज भारत में एक औसत शादी का खर्च ₹25 लाख से ₹40 लाख तक होता है। यह खर्च शहर, परिवार की सामाजिक स्थिति और उम्मीदों पर निर्भर करता है। WeddingWire India जैसी रिपोर्टों के अनुसार, पिछले दो सालों में शादी का खर्च लगभग 28% बढ़ गया है। इसका कारण महंगे वेन्यू, इवेंट मैनेजमेंट, कई दिनों तक चलने वाले कार्यक्रम, फिल्म जैसी फोटोग्राफी और सोशल मीडिया पर “परफेक्ट शादी” दिखाने की चाह है। अब परिवार शादी को सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि ज़िंदगी की सबसे बड़ी याद और सामाजिक स्टेटस का प्रदर्शन मानने लगे हैं, जिससे बजट अपने आप बढ़ जाता है।
भारत में शादी का बजट आमतौर पर तीन हिस्सों में बँटा होता है। पहला, सादी शादियाँ, जिनमें ₹5–10 लाख के अंदर सीमित मेहमानों के साथ काम हो जाता है। दूसरा, मध्यम वर्ग की शादियाँ, जिनमें ₹10–25 लाख खर्च होते हैं, जिसमें हॉल, खाना, सजावट, कपड़े, फोटो और रस्में शामिल होती हैं। तीसरा और सबसे आम वर्ग है “औसत भारतीय शादी”, जिसमें ₹25–35 लाख खर्च होते हैं। परिवार इस रेंज को इसलिए चुनते हैं ताकि शादी न ज़्यादा सादी लगे और न ही रिश्तेदारों की नज़र में कमज़ोर दिखे।
इसके ऊपर आती हैं लग्ज़री और डेस्टिनेशन शादियाँ, जिनका खर्च ₹50 लाख से शुरू होकर ₹70–80 लाख या उससे भी ज़्यादा हो सकता है। अमीर तबके में तो करोड़ों की शादियाँ भी आम हैं। लेकिन ज़्यादातर परिवार बीच में फँसे होते हैं—वे समाज की उम्मीदों को पूरा करने के लिए अपनी क्षमता से ज़्यादा खर्च कर देते हैं। भारत में “लोग क्या कहेंगे” का दबाव सबसे ज़्यादा शादी के समय ही होता है।
भारत में शादी का खर्च ₹1 लाख से लेकर ₹1 करोड़ तक हो सकता है। यह फर्क समाज की बनावट, आर्थिक स्थिति और सांस्कृतिक परंपराओं के कारण है। खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि शादी गाँव में है या शहर में, छोटे कस्बे में है या मेट्रो सिटी में, कितने मेहमान बुलाए गए हैं और कितने दिन के कार्यक्रम हैं। छोटे शहरों में ₹10 लाख की शादी बहुत बड़ी मानी जाती है, जबकि मुंबई या दिल्ली में इतने में सिर्फ हॉल या खाना ही मुश्किल से कवर होता है।
वेन्यू का खर्च ही बजट का बड़ा हिस्सा खा जाता है। बड़े शहरों में एक अच्छा बैंक्वेट हॉल या होटल ₹3–10 लाख प्रति दिन तक ले सकता है। इसके अलावा सजावट, लाइटिंग, स्टेज, एंटरटेनमेंट, फोटोग्राफी, वीडियो, गाड़ियाँ, मेहमानों की रहने की व्यवस्था और मेहंदी, हल्दी, संगीत, रिसेप्शन जैसे कार्यक्रम सब मिलकर खर्च को कई गुना बढ़ा देते हैं।
सोशल मीडिया ने शादियों को एक शो बना दिया है। आज हर कपल “इंस्टाग्राम वाली शादी” चाहता है फिल्मी वीडियो, ड्रोन शॉट्स, थीम सजावट, मैचिंग कपड़े और खूबसूरत जगहों पर प्री-वेडिंग शूट। यह दिखावे की चाह शादियों को और महंगा बना रही है। अलग दिखने और शानदार लगने की होड़ खर्च बढ़ाने का बड़ा कारण बन चुकी है।
भारतीय शादी उद्योग कई दूसरे उद्योगों से जुड़ा हुआ है गहने, कपड़े, होटल, खाना, इवेंट मैनेजमेंट, ट्रांसपोर्ट, फूल, फोटोग्राफी, ट्रैवल और बहुत कुछ। अनुमान है कि भारतीय शादी उद्योग अब ₹10–11 लाख करोड़ का हो चुका है। हर साल भारत में लगभग 45–50 लाख शादियाँ होती हैं, जिनमें सबसे ज़्यादा शादियाँ सर्दियों के मौसम में होती हैं।
शादी का बजट परिवार की सामाजिक हैसियत से भी जुड़ा होता है। कई परिवार अपनी क्षमता से ज़्यादा खर्च सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि समाज में उनकी इज़्ज़त बनी रहे। बेटियों की शादी में यह दबाव और भी ज़्यादा होता है, जहाँ कई परिवार अपनी पूरी जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं या कर्ज़ ले लेते हैं। इसका असर शादी के बाद कई सालों तक रहता है।
हालाँकि अब युवाओं की सोच बदल रही है। आज के कई युवा सादी शादियाँ, कोर्ट मैरिज, मंदिर में विवाह या छोटे समारोह पसंद कर रहे हैं। वे दिखावे से ज़्यादा आर्थिक सुरक्षा को महत्व देते हैं। ₹20–30 लाख एक दिन में खर्च करने की बजाय वे घर, पढ़ाई, बिज़नेस, यात्रा या भविष्य में निवेश करना चाहते हैं। भले ही बुज़ुर्ग अब भी भव्यता पसंद करते हों, लेकिन युवा धीरे-धीरे प्राथमिकताएँ बदल रहे हैं।
फिर भी समाज का दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सोशल मीडिया पर जब लोग चमकदार शादियाँ देखते हैं चाहे सेलिब्रिटी की हों या आम लोगों की तो उम्मीदें बढ़ जाती हैं। हर कोई चाहता है कि उसकी शादी पिछली शादी से “थोड़ी बेहतर” दिखे। यही अनकही प्रतियोगिता खर्च बढ़ा देती है। इवेंट कंपनियाँ और वेडिंग प्लानर भी इसी भावना का फायदा उठाते हैं।
शादी उद्योग रोज़गार देता है, लेकिन साथ ही आर्थिक दबाव भी बढ़ाता है। एक तरफ लाखों लोगों को काम मिलता है, दूसरी तरफ परिवारों पर कर्ज़ और तनाव बढ़ता है।
आखिरकार, शादी में सबसे ज़रूरी रिश्ता होता है, सजावट नहीं; साथ होता है, बजट नहीं। लेकिन आज की शादियों में भावनाओं से ज़्यादा दिखावे को महत्व दिया जाने लगा है। फिर भी यह सच है कि चाहे शादी ₹5 लाख की हो या ₹50 लाख की, वह भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा बनी रहेगी। अब बदलाव शुरू हो चुका है—लोग ऐसी शादियाँ चाहते हैं जो खूबसूरत हों, यादगार हों, लेकिन बोझ न बनें। शायद आने वाले समय में भारत फिर से सादगी और सच्चे रिश्तों की ओर लौटे, जहाँ प्यार की कीमत पैसों से ज़्यादा हो